| याद उनकी
याद उनकी हमें पल-पल सताए क्यूँ? खुश्क अँखियों में समंदर आए क्यूँ? पानी को तरसते जिस वीराने में, दर्द का सागर वहाँ पहुँच जाए क्यूँ? तन्हा रात कटती नहीं बगैर तेरे, ख़ुशी का इक लम्हा यूँ गुज़र जाए क्यूँ? इन्कार का गिला ना किया जब हमनें, मेरी आह पर इलज़ाम लगाए क्यूँ? कहता है प्यार है बेपन्हा मुझसे, हर मोड़ पर हमें यूँ आज़माए क्यूँ? महसूस नहीं कर सके मेरे गम को, आज मेरे दर्द पे मुस्कुराए क्यूँ? हर इल्ज़ाम वो देता है इस दिल को, फिर भी मासूम बना नज़र आए क्यूँ? |
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Friday, August 19, 2011
Posted by Urmi at 9:39 AM 31 comments
Monday, August 15, 2011
| स्वतंत्रता दिवस
वतन हमारा ऐसे न छोड़ पाए कोई, रिश्ता हमारा ऐसे न तोड़ पाए कोई, जान लुटा देंगे, वतन पे हो जायेंगे कुर्बान, सब मिलकर कहते हैं हमारा देश महान ! कई धर्मों का हमारा देश है, फिर भी एक दूजे से प्यार है, कितने लोग, है अलग-अलग भाषाएँ, फिर भी सबकी एक जुबां है ! हम अपने देश का सम्मान करें, शहीदों की शहादत याद करें, सब हाथों पे हाथ रखकर कहें, जो कुर्बान हुए, उनके लफ़्ज़ों को आगे बढ़ाएं ! मिलकर हम सब यतन करें, हिन्दुस्तान हमारा खुशहाल रहे, अपने ध्वज की जो मर्यादा करें, वही भारत का सच्चा नागरिक कहलाये ! मुश्किल नहीं कोई भी काम, हम करते है तिरंगे को सलाम, जब जब ये तिरंगा लहराएगा, देशभक्ति के किरणों को फैलाएगा ! ये ध्वज हिस्दुस्तान की शान है, इस देश के बलिदानों की जान है, ये देश है हमारा, हम इसे बचाए, आओ गर्व से स्वतंत्रता दिवस मनाये ! |
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Posted by Urmi at 12:21 AM 32 comments
Thursday, August 11, 2011
| शब्दों के अश्क
कलम ये जब-जब रोती है, शब्दों में अश्क पिरोती है ! अश्कों में स्याही घुलकरके, गीतों के दुःख में सोती है ! इक हाथ से ज़ख्म दिया करती, दूजे से मरहम दे रोती है ! तेरी कमी में बिखरती हूँ, तेरी यादें नयन भिगोती हैं ! रात बढ़ते ही सन्नाटा छाए, तेरे बगैर अब कुछ न भाए ! है पहचान हमारी बरसों की, फिर भी लगे यूँ कि हो अजनबी ! अब न कुछ लिखना चाहे, ये कलम यूँ मुरझाना चाहे ! सिर्फ़ अश्क ही अपने साथ रहे, तुझे पास बुलाकर दर्द कहें ! |
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Posted by Urmi at 3:16 AM 29 comments
Thursday, August 4, 2011
| मेरा शहर मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, अब किसी के पास बात करने का वक़्त कहाँ ! मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, कभी बहारों का आशियाना था जहाँ, अब पतझड़ के पेड़-सा लगता है सुना ! मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, वो वक़्त गया जब एक दूजे के लिए जीते, आज वही लोग सब स्वार्थी बन गए ! मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, कभी दोस्त जो लगते थे अपने, अब सारे लोग अजनबी-से लगने लगे !मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, आसमाँ है वही, हवाओं में है खुशबू वही, खो गया है वो प्यार, वे जज़्बात कहीं !मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, कभी फूलों की तरह खिलता था बचपन यहीं, अब बिखर गया है टूटे दर्पण-सा कहीं !मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, ख्वाहिश है इसके ज़र्रों में ज़िन्दगी भरूँ, आने वाले सुनहरे कल के साथ हर खुशियाँ समेटूँ ! मेरा शहर जो रंग बदलता ही रहा, कभी खोया, कभी पाया, जैसे समंदर की लहर, रह-रहकर अब सपनों में भी रुलाता मेरा शहर ! |
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Posted by Urmi at 11:09 PM 36 comments
Thursday, July 28, 2011
| सपनों की गलियों में तुम्हारी आवाज़ सुनकर लगा ऐसे, लम्बे-अँधेरे सफ़र में दूर कहीं, दिख गया हो कोई दीपक जैसे ! एक मुलाकात से महसूस होता है ऐसे, मेरे ही सपनों की गलियों में कहीं, कोई मंज़िल की राह दिखा गया हो जैसे ! कभी कोई ख्याल आता है तुम्हारा, मेरे दिल को छू जाता है ऐसे, तुमसे मिलने की आस जगी हो जैसे ! दूर रहकर भी पास रहती हूँ मैं ऐसे, मेरी उम्मीदों के क्षितिज पर कहीं, मिल गए हों ज़मीं और आसमां जैसे ! सोचती हूँ मैं हर लम्हा हर पल ये ही, "तुम ख़ुद कोई ख़्वाब तो नहीं हो मेरा?" ये दिल मुझसे, मैं दिल से अक्सर कहती हूँ ! |
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Posted by Urmi at 9:25 PM 36 comments
Friday, July 22, 2011

बम ब्लास्ट
बम ब्लास्ट की आवाज़ जब मुंबई में बरसी,
तब हर जान ख़ुद को बचाने को तरसी,
पलक झपकते ही हो गई तबाही,
मौत के घाट उतार दिए गए सभी !
कुछ इलाके के लोग बेखबर थे,
हमले के स्थल पर लोग शोक मना रहे थे,
न जाने कितने मासूम लोगों की जानें गईं,
परिवार में अपनों की अपूर्णता छा गई !
आख़िर क्यूँ हुआ पहले सा भयंकर हादसा?
है सबके मन में ये एक ही जिज्ञासा,
क़ाश कसब को फांसी मिल गई होती,
आतंकवादी को जीती जागती सीख मिलती !
दुःख होता है ऐसे हादसे होते हुए देखकर,
अपने देश को बर्बादी से बचाना है मिलकर,
इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है,
इंसान की मदद करना सबसे बड़ा कर्म है !
Posted by Urmi at 12:27 AM 33 comments
Sunday, July 17, 2011
आसमान इतने बड़े आसमान में से, एक कोना ही हमें दे देते, कोई नाम न हम तुम्हें देते, तुम हमें कोई नाम नहीं देते ! कितने खेल खेल लेते हो, कभी धूप कभी बारिश बनके, छाँव में बैठ तुम्हें निहारूँ तो, काश सुना पाती दर्द मन के ! कभी इशारे से जो मुझे कहते, तुम्हें दिल का हाल सुनाती, तुमसे कुछ पूछूँ तो भला कैसे, जवाब तुमसे कुछ नहीं मैं पाती ! ढूँढ़ रही हूँ ख़ुशी मैं हर तरफ़, न जाने कब कहाँ मिलेगी, तुमसे ही उम्मीद मुझे बाकी, तेरे आंगन मेरी बगिया खिलेगी ! |
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Posted by Urmi at 8:57 PM 33 comments






