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Thursday, October 13, 2011

ग़ज़ल सम्राट

पृथ्वी है लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन है एक अनंत कहानी,
जन्म-मरण का ये अविरल फेरा,
जीवन बंजारों का है डेरा !

जीवन का ये दस्तूर, आज यहाँ कल कहाँ,
प्रतिदिन जीवन में आता है परिवर्तन,
जीवन की ढलने जाती है सांझ,
तब उमर भी नहीं देती है साथ !

जगजीत सिंह जी को कोई भूल न पायेगा,
उनके जैसा सुर-साधक कोई दूजा न आयेगा,
विश्वभर में विख्यात था जिनका अंदाज़,
गूँज रही है अब भी उनकी मधुर आवाज़ !

दुनिया को छोड़ गए करके शुन्यता,
हर चेहरे पे छा गई है उदासीनता,
ग़ज़ल सम्राट के नाम से थे मशहूर,
उनको मेरा
श्रद्धा-नमन है भरपूर !

Sunday, October 9, 2011

दर्द

रूठी तन्हाई,
दर्द की बाहें घिरी,
ढूँढें मंज़िल !


मूक ज़िन्दगी,
सब सहे ज़िन्दगी,
फिर भी चले !

अचंभित हूँ,
धडकनें जो मिली,
रूकती नहीं !

आँखें छलके,
बहे तपते आँसू,
फिर भी जागे ?

बिना सहारे,
तेरी आस में जिए,
यही है जीना ?

सहन नहीं,
यूँ घुटकर जीना,
ज़हर पीना ?

Sunday, October 2, 2011

गाँधी जयंती

राष्ट्रपिता तुम कहलाते हो,
सभी प्यार से कहते बापू !

तुमने हम सबको मार्ग दिखाया,
सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाया !

हम सब तेरी संतानें हैं,
तुम हो हमारे प्यारे बापू !

सीधा-सादा वेश तुम्हारा,
नहीं कोई अभिमान !

खादी की एक धोती पहने,
वाह रे बापू तेरी शान !

एक लाठी के दम पर तुमने,
अंग्रेजों की जड़ें हिलाई !

भारत माँ को आज़ाद कराया,
रखी देश की शान !

आज तुम्हारे जन्मदिवस पर,
हम करते हैं शत शत नमन !


Friday, September 23, 2011

ख़ाक होने से पहले

रूठे हो मुझसे, बात भले न करना तुम,
सिर्फ़ एक बार सीने से लगालो तुम !


ख़ाक होने से पहले जो पुकारूँ नाम,
सुनके मुझे पास में बुलालो तुम !

वक्त की धारा में बिछड़े हैं हम दोनों,
बनके कश्ती किनारे पे लगालो तुम !

तन्हाई का शिकार हूँ मैं, जानते हो तुम,
तन्हा न करो और मुझे संभालो तुम !

दूर रहकर भी तुम अपने-से लगते हो,
पास आकर अजनबी न बनालो तुम !

सहारा नहीं माँगा है तुमसे मगर,
मझधार से अब तो निकालो तुम !


Friday, September 2, 2011

ख़्वाबों में मत तराश

उदास रात की कोई सुबह हसीन नहीं होती,
ख़ुशी के एक लम्हें के लिए तरस जाती !

न आसमाँ है मेरा, न ज़मीन ही है मेरी,
जिसे माना अपना, बेगाना-सा लगे वहीँ !

मैं ख़ुशबू बनकर हवा में नहीं बसती,
मैं किरणों की तरह महीन भी नहीं !

मुझे तू ख़्वाबों में मत तराश अभी,
उड़ती तितली की तरह मैं रंगीन नहीं !

छुप जाते हैं बादल में कभी चाँद व तारे,
गुमसुम रहकर देखती हूँ वो सब नज़ारे !

भुला दिया उसने प्यार करके मुझे,
मिलने पर वो पहचाने, मुझे ये यकीन नहीं !

टूटे हुए कांच की तरह बिखर गई मैं तो,
मिले न अब पनाह तक, ये सोचकर रोयी !

बुझ गया ये "दीप", सुबह के सितारे के लिए,
खुश हूँ मिटकर भी, मैं ज़रा गमगीन नहीं !

Sunday, August 28, 2011

दरिया

सागर से बिछड़ा दरिया हूँ मैं,
क़ाश कहीं पर फिर मिल जाऊँ,
बादल ने चुराया जिसका पानी,
उस धरा को आज भिगो जाऊँ !

कैसे रहूँ बिन सागर के मैं,
अधूरा सा रहने लगा हूँ उसके बिन,
सागर से संगम कब होगा?
ये आस लिए मैं बिखरी धरा पर !

न लाया था कुछ, न ले जाऊँ,
समंदर में फिर समा जाऊँ,
इस मोह से बंधन टूटा पर,
इस माया से कैसे मुक्ति पाऊँ?

कुछ क़र्ज़ लिए थे दे जाऊँ,
कुछ अश्क मिले थे पी जाऊँ,
मैंने भी पाया ज़ख्म यहाँ पर,
मगर औरों को खुशियाँ दे जाऊँ !

Monday, August 22, 2011

कान्हा का जन्मदिवस

माखन खाए, शोर मचाये,
गोपियों के संग रास रचाए,
मुरली बजाके मन बहलाए,
है वो नटखट नंदगोपाल !

गोकुल में करे जो निवास,
सबके मन में है कान्हा का वास,
बारिश में झूमे सारी गोपियाँ,
कान्हा देखे गोपियों की मस्तियाँ !

माखन चुराकर जिसने खाया,
बंसी बजाकर जिसने नचाया,
ख़ुशी मनाओ उनके जन्म की,
जिसने दुनिया को प्रेम करना सिखाया !

बच्चे बूढ़े सभी झूमे मस्ती में,
सबके दिल में है ज़ोश उत्साह,
उमंग से भरा ये पल रहे हमेशा,
कान्हा का आशीर्वाद रहे सर्वदा !