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Sunday, June 26, 2011



मुलाकात

लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात,
रंगों से भरे ख़्वाब-सी एक शाम,
थाम लिया था तुमने जो मेरा हाथ,
देखा था हर नज़ारा हमनें एक साथ !

खाईं थी कसमें साथ निभाने की,
जीवन के हर मोड़ पर साथ देने की,
तुम्हारी बाहों में सुकून मिलता मुझको,
तुमसे मिलकर ख़ुशनसीब समझी ख़ुदको !

कहाँ चले गए जाने तुम उस पल के बाद,
करती हूँ इश्वर से तुम्हारे लौटने की फ़रियाद,
दिखाए थे तुमने प्यार-भरे मीठे सपने,
क्षणभर में कर दिए वे बेगाने तुमने !

जुदाई के अँधेरे में मुझे छोड़ गए तुम,
रहने लगी हूँ मैं सुबह से शाम गुमसुम,
तन्हा देख रही हूँ आसमां में वो नज़ारे,
चादर के जैसी फैली हुई जगमगाते तारे !

34 comments:

arvind said...

लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात,
रंगों से भरे ख़्वाब-सी एक शाम,
थाम लिया था तुमने जो मेरा हाथ,
देखा था हर नज़ारा हमनें एक साथ ....bahut hi khoobasoorat najm.

Rakesh Kumar said...

कहाँ चले गए न जाने तुम उस पल के बाद,
करती हूँ इश्वर से तुम्हारे लौटने की फ़रियाद,
दिखाए थे तुमने प्यार-भरे मीठे सपने,
क्षणभर में कर दिए वे बेगाने तुमने !

हाय! प्रीतम की निष्ठुरता कितनी दुखदाई होती है.
गोपियाँ भी कृष्ण के बिछुड़ने पर कितना रोती थी,तडफती थी,कलपती थी. यह सूरदास जी ने कितने सुन्दर ढंग से वर्णित किया है

अँखियाँ हरि दर्शन की प्यासी
देखत चाहत कमल नयन को,
निशदिन रहत उदासी

आपकी भावुक सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

Shekhar Suman said...

बहुत खूब...बेहतरीन लिखा है....

रविकर said...

यही तड़प यही जज्बा उधर भी है |

तुम्हारे तड़प की उसे खबर भी है |

उसे भी याद आतें है रूमानियत के पल

लौटकर आएगा वो जिधर भी है ||

Dr Varsha Singh said...

जुदाई के अँधेरे में मुझे छोड़ गए तुम,
रहने लगी हूँ मैं सुबह से शाम गुमसुम,
तन्हा देख रही हूँ आसमां में वो नज़ारे,
चादर के जैसी फैली हुई जगमगाते तारे !


जगमगाते तारों की खूबसूरत चादर और लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात.....आपकी इस प्यार भरी कविता की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है |आपको हार्दिक मेरी शुभकामनाएं .

Unknown said...

Kitni sundar kavita , kitne sundar bhav.aabhar

Anamikaghatak said...

आपकी भावुक सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार

Anonymous said...

lovely poem
really beautiful as u

Kailash Sharma said...

तन्हा देख रही हूँ आसमां में वो नज़ारे,
चादर के जैसी फैली हुई जगमगाते तारे !...

बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी प्रस्तुत..

Dr (Miss) Sharad Singh said...

दिखाए थे तुमने प्यार-भरे मीठे सपने,
क्षणभर में कर दिए वे बेगाने तुमने !

उलाहने में भी भोलापन...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन.

सादर

पी.एस .भाकुनी said...

sunder prastuti...
abhaar.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

जी बहुत सुंदर रचना

कहाँ चले गए न जाने तुम उस पल के बाद,
करती हूँ इश्वर से तुम्हारे लौटने की फ़रियाद,

क्या बात

Kunwar Kusumesh said...

क्या बात है.
रूमानियत से लबरेज़ एक एक शब्द है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विरह की बेचैनी को कहती अच्छी रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर रचना!
आपने मुलाकातों को लेकर अच्छी रना पोस्ट की है!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात,
रंगों से भरे ख़्वाब-सी एक शाम,
थाम लिया था तुमने जो मेरा हाथ,
देखा था हर नज़ारा हमनें एक साथ ...

bahut khub!!
kya kahun..shabd kam hai...

नश्तरे एहसास ......... said...

लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात,
रंगों से भरे ख़्वाब-सी एक शाम,
थाम लिया था तुमने जो मेरा हाथ,

khoobsurat ehsaason se bhari nazm..

डॉ. मोनिका शर्मा said...

जुदाई के अँधेरे में मुझे छोड़ गए तुम,
रहने लगी हूँ मैं सुबह से शाम गुमसुम,
तन्हा देख रही हूँ आसमां में वो नज़ारे,
चादर के जैसी फैली हुई जगमगाते तारे !

Bahut Sunder.....

Amrit said...

Very very good :)))

Simply Speaking "A" Simple Blogger

G.N.SHAW said...

ग़मगीन कविता और अद्भुत यादे ! सुन्दर

Dr. Naveen Solanki said...

good one.......i can say appealing............:)

regards
Naveen solanki
http://drnaveenkumarsolanki.blogspot.com/

गिरधारी खंकरियाल said...

हर पतझड़ के बाद वसंत , हर अमावस्या के बाद पूर्णिमा अवश्य aati है इसलिए विरह के बाद मिलन भी निश्चित समझें .

vidhya said...

बहुत खूब...बेहतरीन लिखा है....


aap se mara aanuroth hai ke may aaacha aake hindhi lekhane ka link muje ccaheya ho sake to muje bataeyaga, take may be aur aacha lekh saku

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

वाह............
प्रेम रस में सराबोर रचना .....बहुत अच्छी लगी

amrendra "amar" said...

लम्हा लम्हा याद आती है वो मुलाकात,
रंगों से भरे ख़्वाब-सी एक शाम,
थाम लिया था तुमने जो मेरा हाथ,
देखा था हर नज़ारा हमनें एक साथ


भावुक सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन.


सादर

शिवम् मिश्रा said...

बहुत सुन्दर रचना!

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

उलाहना देने का मासूम अंदाज बड़ा ही खूबसूरत लगा.सुंदर प्रस्तुति.

मनोज कुमार said...

बहुत सुन्दर कविता.

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर रचना!... भावुक सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आज पूरे 36 घण्टे बाद ब्लॉग पर आना हुआ!
--
आपकी रचना पढ़ी।
बहुत पसंद आई!

Satish Saxena said...

बहुत खूब ...सादर शुभकामनायें !

मो. कमरूद्दीन शेख ( QAMAR JAUNPURI ) said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
गम न कर जो वे तेरे इस प्यार के न आभारी रहे
मोल हीरे का क्या जाने कांच के जो व्यापारी रहे।