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Tuesday, October 27, 2009





आंखें


सागर से भी गहरी है ये आंखें,
जो बिन बोले सब कुछ कह देती है,
जब लब पे बात आकर रूक जाती है,
तब मन की हर बात कह देती है ये आंखें !

कभी
खुशी झलकती है इन आँखों में,
कभी आंसू बनकर बरस पड़ती है,
कभी मासूमियत से भरी होती है,
पल पल रंग बदलती हैं ये आंखें !

कोई ढूंढें इन आँखों में दिल का करार,
तो कोई ढूंढें उनमें अपना प्यार,
दिखती है किसीको जन्नत इसमें,
तो किसीको नज़र आती है सिर्फ़ नफ़रत !

20 comments:

Dhiraj Shah said...

खुबसुरत कविता...

Unseen Rajasthan said...

Kitna acha likha hai apne ankho ke bare me !! Yeh kavita hridaya to chu gayi.Itni achi kavita ke liye badhai..Unseen Rajasthan

संजय भास्कर said...

Sagar se gehri aankhe

खुबसुरत कविता...

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

मुकेश कुमार तिवारी said...

उर्मी जी,

जी हाँ, आँखों में समायी हुई दुनिया को आज महसूस किया कविता में।

" पल पल रंग बदलती हैं ये आंखें !"

यह पंक्तियाँ हमारे सारे क्रिया-कलापों का कच्चा-चिट्ठा खोल रही हैं, आँखें बोलती हैं... सच ही है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

JHAROKHA said...

कोई ढूंढें इन आँखों में दिल का करार,
तो कोई ढूंढें उनमें अपना प्यार,
दिखती है किसीको जन्नत इसमें,
तो किसीको नज़र आती है सिर्फ़ नफ़रत !

आंखों को लेकर लिखी गयी सुन्दर रचना---आंखों को लेकर मैनें भी पिछले साल एक कविता 23-11-08 को पोस्ट की थी।मौका लगे तो पढ़ियेगा।
शुभकामनाओं के साथ।
पूनम

विजयप्रकाश said...

पल पल रंग बदलती हैं ये आंखें !
बहुत अच्छे भाव, बड़े मन से लिखी है ये पंक्तियां आपने

KAVITA said...

Bahut ahhi kavita. Ankhen sabkuch bata deti, bus unki bhasha samajhani ki aawaskata hoti hai.
Badhai.

RAJ SINH said...

बबली ,
बड़े सुन्दर भाव . तुम्हारी इस कविता की शान में ........

जो लब नहीं कह पाते वो कह जाती हैं आँखें
जो दिल में छुपा हो वो बता जाती हैं आँखें
आँखों के झरोखों से तो हम देखते दुनिया
दुनिया के कई रंग बता जाती है आँखें .

M VERMA said...

आँखे बेमिसाल है
ये तो एक खयाल है
---
बहुत अच्छी रचना

शरद कोकास said...

बस इन आँखों का पानी न मरे कभी ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आँखें कभी छला करती हैं,
आँखे कभी खला करती हैं।
गैरों को अपना कर लेती-
आँखें कभी गिला करती हैं।।

बबली जी।
आपने सुन्दर भावनाओं से सजी हुई
कविता पेश की है।
बधाई!

नीरज गोस्वामी said...

आँखों पर लिखी आपकी इस अद्भुत रचना ने मन मोह लिया...अति सुन्दर...
नीरज

Mahesh Sindbandge said...

Thats a beautiful poem bubli :) i loved it till the end you know..

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

har baar ki bhanti... is baar bhi ek achhi kavita...

महफूज़ अली said...

कोई ढूंढें इन आँखों में दिल का करार,
तो कोई ढूंढें उनमें अपना प्यार,
दिखती है किसीको जन्नत इसमें,
तो किसीको नज़र आती है सिर्फ़ नफ़रत !


wah! in panktiyon ne dil chhoo liya.... bahut hi khoobsoorat kavita....

Amit K Sagar said...

आपकी लेखन की महत्वपूर्णता शायद यही है कि आप बहुत सीधा-सरल लिख देती हैं. बहुत अच्छी रहना.

संजय भास्कर said...

BEAUTIFUL.........

satish kundan said...

aankhe to inshan ki mausham se bhi tej badalti hai...bahut khubsurat rachna..

CSK said...

देखो छलक न जाये अब ये जाम तेरी आँखों से...
हमको फंसा न देना कर बदनाम तेरी आँखों से...
लुट जायेंगे सब तेरी चाहत के ये दीवाने...
उन पर लगा न देना अब इल्जाम तेरी आँखों से....!

परवाना सुनता है अब हर नाम तेरी आँखों से...
दीवाना है देख रहा अंजाम तेरी आँखों से...
खुद को साबित करने को हैं बेतरतीब निगाहें..
इनका मत लेना कोई एग्जाम तेरी आँखों से...!

दीवानों का तो है पीना अब "काम" तेरी आँखों से..
उनको तू ये दे देना पैगाम तेरी आँखों से...
के, परवानों का शिद्दत से यूँ दरिया में बह जाना,
कर जाता है घायल क्यूँ ये जाम तेरी आँखों से...?