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Saturday, March 20, 2010




गर्मी

गर्मी और तेज़ धूप में है बेहाल,
कैसे बयान करें कोई अपना हाल,
दिखते हैं कहीं पंछियाँ,
गूंजे संगीत दिखे तितलियाँ !

रंग बिरंगे फूलों से भरे पौधे,
गर्मी में सुखकर झड़ रहे हैं पत्ते,
मज़दूरी करके पेट पालते हैं गरीब,
बन चुका है अब यही उनका नसीब !

इंतज़ार रहता है सूरज के उगने का,
पर वही सूरज की किरण लेती है जान,
जलती गर्मी में दोपहर के वक़्त,
पानी के लिए तरसता है हर शक्स !





10 comments:

Suman said...

न दिखते हैं कहीं पंछियाँ,
न गूंजे संगीत न दिखे तितलियाँ .nice

संजय भास्कर said...

रंग बिरंगे फूलों से भरे पौधे,
गर्मी में सुखकर झड़ रहे हैं पत्ते,
मज़दूरी करके पेट पालते हैं गरीब,
बन चुका है अब यही उनका नसीब !

LAJWAAB PANKTIYA PASAND AAI
BABLI JI JWAAB NAHI AAPKA

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

jamos jhalla said...

misthi

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

awesome is the word!

विजयप्रकाश said...

बहुत सुंदर...ग्रीष्म ऋतु का यथार्थ एवं सुंदर वर्णन किया है.

भूतनाथ said...

babli.......ye bhoot to ro padaa aaj....ab kuchh bola nahin jata...!!

JHAROKHA said...

रंग बिरंगे फूलों से भरे पौधे,
गर्मी में सुखकर झड़ रहे हैं पत्ते,
मज़दूरी करके पेट पालते हैं गरीब,
बन चुका है अब यही उnaka naseeb
bahut hi sndar geet babli ji ek behatareen rachana ke liye badhai.

arun c roy said...

urmi ji sunder rachnayen hai.. bhavpoorn!

Yatish Jain said...

बहुत बढ़िया