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Wednesday, May 4, 2011


नदी

सुन्दर वादियों में निकल पड़े हम,
पर्वत से बहती नदियाँ देखने लगे हम,
क्या गज़ब दृश्य है,जैसे एक सपना है,
पशु, पक्षियाँ, पेड़ सब जैसे अपना है !

कुहू कुहू मीठे आवाज़ में पुकारती पंछी,
छल छल आवाज़ करती, मीठे राग सुनाती नदी,
बारीश के मौसम में होगा क्या नज़ारा,
इन वादियों में खोने को दिल करता है हमारा !

लहराके बलखाके बहती रहती है नदी,
पलभर के लिए लगे, बस जाये हम यँही,
तटपर बिखरती है सौंदर्य अपनी नदी,
देखकर मन खिल उठे हर घड़ी !

चाहे कितने ही युग क्यूँ बीते,
हज़ार बाधाएँ नदी क्यूँ सहे,
छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी !

25 comments:

Apanatva said...

beetee kaee hai sadiya
jeevan aadhar hai nadiya


sunder kavita

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर अभिव्यक्ति ..नदी की तरह ही बहना सीखें

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

मैं भी सोच रहा था कि शायरी आ गयी पर कविता कहाँ है.. अब मिली.. बहुत सुन्दर.. नदियों को तो हम माता कहते आए हैं!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!
--
चाहे कितने ही युग क्यूँ न बीते,
हज़ार बाधाएँ नदी क्यूँ न सहे,
छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी!
--
सुन्दर प्रकृति चित्रण किया है!

Kunwar Kusumesh said...

नदिया,पहाड़,हरियाली,पशु-पक्षी सबका खूबसूरत वर्णन आपकी इस कविता "नदी" में देखने को मिला.चित्र तो और भी सार्थकता प्रदान कर रहा है.

संजय भास्कर said...

कुहू कुहू मीठे आवाज़ में पुकारती पंछी,
छल छल आवाज़ करती, मीठे राग सुनाती नदी,
बारीश के मौसम में होगा क्या नज़ारा,
...सुन्दर प्रकृति चित्रण किया है!

संजय भास्कर said...

बहुत ही बेहतरीन वापसी कि है आपने बबली जी...

नीरज गोस्वामी said...

बहुत समय बाद आपकी इतनी सुन्दर रचना पढने को मिली. अच्छा लगा.
नीरज

A said...

Wow.....beautiful

SACCHAI said...

चाहे कितने ही युग क्यूँ न बीते,
हज़ार बाधाएँ नदी क्यूँ न सहे,
छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी !
so nice ..ek acchi rachana

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति..... मन के बहते भाव

ana said...

सुन्दर अभिव्यक्ति .....बहुत बढ़िया

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

बबली जी,
बड़े दिनों के बाद आपके यहाँ आना हुआ, कैसे हैं आप, रचना हर बार की तरह बहुत खूबसूरत है!

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर प्रकृति चित्रण..बस यही कामना है कि इसी तरह बहती रहें हमारी नदियाँ..

संध्या शर्मा said...

छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.....भावनाओं सी बहती नदी अविरल बहती....

JHAROKHA said...

babli ji
bahut bahut hi sundar rachna .puri prakriti ko aapne apni kavita me smet kar rakh diya hai
Wah! behtreen prkriti chitran
bahut bahut badhai
poonam

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! बहुत अच्छी लगी यह कविता। मेरा भी मन ऐसी वादियों में, ऐसा ही हुआ है..
..बहुत बधाई।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अलोचक के रूप में कमेंट...

अधजल गगरी करती छल छल
बहती नदिया करती कल कल

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। एक लंबे अंतराल के बाद आपके पोस्ट पर आया हूं।अच्छा लगा। धन्यवाद।

Rajesh Kumari said...

first of all i would like to thank you for your precious comment on my blog.Babli aapke blog par pahli bar aai hoon,ek pyaari maasoomiyat se bhari kavita Nadi padhne ko mili.sahi hai manobhaav aur nadi ka bahaav ek jaisa hai.

Rakesh Kumar said...

आपके मधुर सुन्दर भावों को नदी रूप में बहता देख मन मगन हों गया.आपकी प्रस्तुति शानदार और मोहक है.क्या बेहतरीन गूंथा है शब्दों को आपने:-
लहराके बलखाके बहती रहती है नदी,
पलभर के लिए लगे, बस जाये हम यँही,
तटपर बिखरती है सौंदर्य अपनी नदी,
देखकर मन खिल उठे हर घड़ी !

मेरे ब्लॉग पर आप आयीं ,इसके लिए बहुत बहुत आभार .
कृपया ,एक बार फिर से आईयेगा.नई पोस्ट पर आपके सुविचारों की आनंद वृष्टि की अपेक्षा है.

Patali-The-Village said...

सुन्दर प्रकृति चित्रण किया है|बहुत बढ़िया|

Dr Varsha Singh said...

चाहे कितने ही युग क्यूँ न बीते,
हज़ार बाधाएँ नदी क्यूँ न सहे,
छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी !

नदी पर बहुत ही सुन्दर रचना.... पढ़ कर मन आनंदित हो गया ! उर्मि जी, नदी तो मेरी रूह में बसती है. नदी अनायास ही प्रतीक बन कर आ जाती है मेरे गीतों-गजलों में.
आपको मेरी अनेक शुभकामनाएँ !

Rachana said...

चाहे कितने ही युग क्यूँ न बीते,
हज़ार बाधाएँ नदी क्यूँ न सहे,
छोड़ेगी नहीं कभी अपने पथ को,
भावनाओं की तरह बहती रहेगी नदी !
sahi kaha hai aapne

शिखा कौशिक said...

bahut sundar bhavabhivyakti .badhai .